श्रीकृष्ण की कूटनीति: भारतीय चिंतन की अमूल्य धरोहर…

श्रीकृष्ण की कूटनीति भारतीय चिंतन परंपरा का एक अनुपम अध्याय है। वे केवल लीला पुरुषोत्तम या दिव्य दार्शनिक नहीं थे बल्कि राजनीति शास्त्र के अत्यंत प्रखर ज्ञाता और धर्मनीति के साक्षात मूर्तरूप भी थे। उनके जीवन और आचरण में यह विशेषता स्पष्ट दिखाई देती है कि वे धर्म को कभी जड़-विधान के रूप में नहीं मानते बल्कि उसे समय, परिस्थिति और न्याय के अनुरूप व्यावहारिक रूप में रूपांतरित करते हैं। उनकी नीति यह सिखाती है कि यदि किसी समाज में धर्म और न्याय की स्थापना करनी हो तो केवल बल या केवल आदर्श पर्याप्त नहीं होते बल्कि दोनों का संतुलन ही वास्तविक विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।

महाभारत युद्ध का प्रसंग श्रीकृष्ण की कूटनीति के बिना अधूरा है। वे अपने कुल और समय के सर्वश्रेष्ठ योद्धा होते हुए भी स्वयं युद्धातुर नहीं होते और न ही हथियार धारण करते हैं। उनका यह निर्णय कोई साधारण सन्यास भाव का परिणाम नहीं था वरन वह गहन राजनीतिक कौशल का परिचायक था। वे यह समझ चुके थे कि महाभारत के युद्ध में यदि वे प्रत्यक्ष योद्धा बनेंगे तो इतिहास उनको एक पक्षकार के रूप में अंकित करेगा। इसी कारणवश वे पूरे महाभारत युद्ध के दौरान एक मार्गदर्शक और सारथी के रूप में अदृश्य शक्तिपुंज बने रहे। यह उनके महान कूटनीतिक कौशल का परिणाम ही था कि वे स्वयं निष्क्रिय प्रतीत होते हुए भी सम्पूर्ण युद्ध की धुरी बने रहे।

हस्तिनापुर में शांति प्रस्ताव लेकर उनका जाना उनकी नीति का ही महत्वपूर्ण पक्ष है। उनके द्वारा पांडवों के लिए केवल पांच ग्रामों की मांग करना यह दर्शाता है कि उनका उद्देश्य स्वार्थलिप्सा न होकर केवल धर्म की स्थापना था। दुर्योधन की ज़िद जब उनके इस सरलतम प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर देती है तब वे यह स्पष्ट कर देते हैं कि अब युद्ध की अग्नि अपरिहार्य है और यह युद्ध धर्मयुद्ध के रूप में ही स्वीकार्य होगा। उनके इस आचरण में दार्शनिक धैर्य भी है और राजनीतिक दूरदृष्टि भी।

युद्धक्षेत्र में अर्जुन का मोहग्रस्त होकर शस्त्र त्यागने का भाव प्रकट करना भी एक संकट की घड़ी थी। यदि उस क्षण अर्जुन पीछे हटते तो न्याय का पतन और अन्याय का वर्चस्व स्थायी हो जाता। ऐसे समय में श्रीकृष्ण ने अपने कालजयी उपदेशों को, जो कि आज श्रीमद्भागवतगीता के रूप में जाने जाते हैं, के माध्यम से न केवल अर्जुन को कर्तव्यपथ पर स्थापित किया बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए धर्मनीति और कर्तव्यपालन का सनातन सिद्धांत भी प्रकट किया। श्रीकृष्ण के उपदेशों का संग्रह गीता केवल आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि वह राजनीति, प्रशासन और जीवन प्रबंधन तक के लिए दिशा-दर्शक ग्रंथ है। इसमें श्रीकृष्ण ने कूटनीति का यह अद्भुत सूत्र दिया कि परिणाम की चिंता में फंसना व्यर्थ है और कर्म और धर्म के पथ पर अडिग रहना ही वास्तविक सफलता है।

इतिहास में श्रीकृष्ण की कूटनीति का दूसरा पहलू यह है कि वे अवसरानुकूल विविध रूपों में भी व्यवहारिक व्यवहार करते दृष्टिगोचर होते हैं। जहां आवश्यक हुआ, वहां उन्होंने सहिष्णुता और विनम्रता दिखाई और जहां अधर्म एक सीमा से आगे बढ़ गया, वहां कठोर निर्णय लेने से भी वे नहीं झिझके। शिशुपाल का वध इसका सजीव उदाहरण है और शांति के सतत प्रयास उनकी उदारता का प्रमाण। उनके ये दोनों रूप यह दर्शाते हैं कि सच्चा नेता वही है जो परिस्थितियों का मूल्यांकन कर उसके अनुसार नीति का अनुसरण करता है न कि वह किसी एक कठोर या शिथिल दृष्टिकोण में बँधकर रह जाता है।

श्रीकृष्ण की कूटनीति हमें यह संदेश देती है कि राजनीति का चरम लक्ष्य केवल राज्य विस्तार या विजय प्राप्ति नहीं होना चाहिए। राजनीति धर्म और न्याय की स्थापना का माध्यम बनकर ही सार्थक होती है। आज के संदर्भ में भी श्रीकृष्ण के आदर्श उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि वे महाभारत काल में थे। आधुनिक समाज और शासन को यदि स्थिरता और संतुलन की ओर अग्रसर होना है तो उसे उनके इस सिद्धांत को अपनाना होगा कि अंतिम विजय वही है जो न्याय, धार्मिकता और सार्वभौमिक कल्याण के आधार पर विभूषित हो।

इस प्रकार श्रीकृष्ण की कूटनीति केवल किसी युद्ध की रणनीति या तत्कालीन संघर्ष की परिणति नहीं है बल्कि यह सनातन संदेश है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो विवेक और धर्म का संतुलन बनाए रखते हुए जनता और राष्ट्र को स्थायी शांति और न्याय की ओर अग्रसर करे। श्रीकृष्ण अपने समय के ही नहीं अपितु अनंतकालिक समस्त मानव सभ्यता के लिए शाश्वत मार्गदर्शक और नीति पुरुष हैं।

अस्तु, द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण के समस्त भक्तों को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं…

शलोॐ…!