स्वतंत्रता के बाद पहली बार द्वि-ध्रुवीय चुनाव लड़े जाने का श्रेय गुजरात को मिला। श्रीमती गांधी भी इस चुनौती एवं उसकी गंभीरता को समझ गईं। यह चुनावी हार उनके राजनीतिक अस्तित्व को ही ख़तरे में डाल सकती है, यह समझना उनके लिए कठिन नहीं था। इसलिए गुजरात के चुनाव जीतने के लिए उन्होंने पूरा ज़ोर लगा दिया। दिन-रात एक करते हुए सौ से भी अधिक जनसभाओं को संबोधित कर उन्होंने जनता को अपनी ओर खींचने का महाप्राण, किंतु असफल प्रयत्न किया। येन-केन-प्रकारेण गुजरात का चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस द्वारा प्रयुक्त सारे प्रयत्न निष्फल रहे। ‘गुजरात की बहू’ की मोहिनी भी अपना कोई प्रभाव न दिखा सकी।

गुजरात की जनता ने अपनी मनोदशा की किसी को भनक तक नहीं लगने दी और इंदिरा गांधी को लगातार चौथी शिकस्त देते हुए जनता मोर्चा के गले में जयमाला पहना दी। इस प्रकार 12 जून, 1975 के दिन भारतीय लोकतंत्र को एक नई दिशा मिली।
गुजरात के जन-आंदोलनों एवं आम-नागरिकों के आक्रोश को कुचल डालने के लिए श्रीमती इंदिरा गांधी एवं उनके सहयोगियों ने अपने सभी उपायों को आज़मा लिया किंतु वे हर बार असफल रहे और जनता निरंतर जीत हासिल करती रही। इतनी निष्फलताएं मानो कम हों, इसी बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने श्रीमती गांधी की डगमगाती स्थिति को एक और धक्का दे दिया। गुजरात के नतीजों और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने कांग्रेस की आंतरिक राजनीति में तूफ़ान मचा दिया। श्रीमती गांधी का सारा मायाजाल ध्वस्त हो गया।
सत्ता लोलुप श्रीमती गांधी किसी भी प्रकार से सत्ता-त्याग के लिए तैयार नहीं थीं। अतः अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए वे और अधिक चिंतित हो उठीं। दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर उनके त्यागपत्र की मांग ज़ोर पकड़ने लगी। उनके सहयोगियों में भी इस मांग के बारे में सहमति बनने लगी। इन सभी विपदाओं से बचाव के लिए इंदिरा जी को एक नए शस्त्र की आवश्यकता महसूस हुई और इस प्रकार इस भय-प्रेरित आवश्यकता ने ‘आपातकाल’ के विचार को जन्म दिया। अनेक बातों से यह सिद्ध होता है कि ‘आपातकाल’ का इरादा 26 जून से बहुत पहले बना लिया गया था और उसके लिए सारी तैयारियां भी पूरी कर ली गई थीं।

दिल्ली में भारत की आज़ादी को आहत करने की योजनाएं बनाई जा रही थीं। उसी समय गुजरात में सही मायनों में लोकतांत्रिक शासन स्थापित करने की तैयारी ‘जनता मोर्चा’ द्वारा की जा रही थी। 19 जून को गुजरात में मोर्चा सरकार ने श्री बाबू भाई पटेल के नेतृत्व में सत्ता की बागडोर संभाली परंतु केवल सात ही दिनों में गुजरात की मोर्चा सरकार की स्थिति किसी अनाथ बालक जैसी हो गई। माता सदृश लोकतंत्र की कोख से जन्मी ‘मोर्चा सरकार’ की मातृशक्ति रूपी लोकतंत्र का ‘आपातकाल’ के रेशमी पाश से गला घोंट दिया गया था।
गुजरात एक वर्ष के लंबे संघर्ष के बाद विश्रांति ले रहा था। लोकनेता भी जनता सरकार बनने के बाद तनिक चैन की सांस ले रहे थे। तभी यकायक 25 जून, 1975 की ग्रीष्मकालीन रात्रि के पिछले पहर गुजरात के नेताओं के टेलीफोन बज उठे। एक अनपेक्षित घटना घटित हुई थी। इतना कठोर कदम सरकार उठाएगी, इसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। रात भर दिल्ली से फोन पर संदेश आते रहे-
-जे. पी. गिरफ़्तार…
-मोरार जी भाई को पकड़ लिया गया…
-नाना जी को ढूंढा जा रहा है…
-संघ के कार्यालय को पुलिस ने घेर लिया…
-राजनीतिक दलों के कार्यालयों पर पुलिस के छापे…
-सारे दिल्ली शहर में पुलिस की गाड़ियां घूम रही हैं…
-कहीं-कहीं पर सेना के वाहन भी दिखाई पड़ रहे हैं…
-अख़बारों से भी संपर्क नहीं हो पा रहा…
-कहीं-कहीं पर टेलीफोन ‘रिसीव’ करने का काम पुलिस द्वारा ही किया जा रहा है…
-माजरा समझ से बाहर है…
-आप लोग अपने स्थान से हट जाएं…
-राष्ट्रीय स्वयं-सेवक संघ के कार्यालय को खाली कर दिया जाए…
-महत्वपूर्ण कागज़ात और फ़ाइलें सुरक्षित स्थान पर भेज दी जाएं…
-दिल्ली आरएसएस कार्यालय से सभी प्रमुख कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया है…
-इन समाचारों से बंबई को अवगत करवाएं…
दूसरा फोन-
-नागपुर की सूचना मिलते ही दिल्ली को अवगत करवाएं…
-वस्तु-स्थिति के स्पष्ट न होने तक गिरफ़्तारी से बचें, सभी को सूचित करें…
-अटल जी, आडवाणी जी बंगलौर में हैं…
-तमिलनाडु सरकार की क्या स्थिति है…
-अनजाने फ़ोन आने पर कोई जानकारी न दी जाए…
रेडियो से ‘तानाशाह’ अपना प्रथम वायु-प्रवचन प्रसारित करवाएं, उससे पहले ही अनेक संदेश और सूचनाएं इस प्रकार दी जा चुकी थीं।
विशेष: उपरोक्त लेखांश भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिखित ‘आपातकाल में गुजरात’ नामक पुस्तक से उद्धृत किए गए हैं जिसे कि उनकी गुजराती भाषा में लिखी गई पुस्तक ‘संघर्षमां गुजरात (‘સંઘર્ષમાં ગુજરાત’)’ से हिंदी भाषा में अनुवादित किया गया है। यह पुस्तक भारत की तत्कालीन तानाशाह रही मैमूना बेगम उर्फ़ इंदिरा गांधी द्वारा देश की ‘स्वतंत्र जनता एवं उसके लोकतंत्र’ को बंधक बनाए जाने के ‘आपातकालीन दौर’ की वास्तविक धरातलीय स्थिति को उजागर करती है। इस पुस्तक को आप टीम बाबा इज़रायली द्वारा विकसित किए जा रहे ‘ई-पुस्तकालय‘ में जाकर पढ़ सकते हैं। आने वाले समय में आपको हमारे इस ई-पुस्तकालय में हिंदू-चेतनाओं, उससे जुड़ी विषमताओं एवं विभीषिकाओं से संबंधित दुर्लभ हिंदू-साहित्य प्राप्त होगा।
शलोॐ…!
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