‘इज़रायली 🇮🇱 नीति’: एक आधुनिकतम कूटनीति

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सृष्टि में सबकुछ समय सापेक्ष है। निरपेक्ष कुछ भी नहीं। भाव, विचार, व्यक्ति, शक्ति, भक्ति, अनुरक्ति- ऐसा कुछ भी नहीं जो संदर्भ-रहित हो। समय-समय पर होने वाले अवतार, प्रवर्तन और आंदोलन सब सापेक्षता के सिद्धांत के अधीन हैं। युग अपने अनुसार, अपने अनुरूप, अपने अनुकूल निमित्त का चयन स्वयं करता रहता है। बाबा इज़रायली भी इससे इतर नहीं।

बाबा इज़रायली! व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व; व्यक्तित्व नहीं, विचारधारा। कैसी विचारधारा! विचारधारा नूतन और सनातन के सेतुबंध की। अनुचित और अशुभ से संघर्ष की, अतीत की महानता के पुनर्स्थापन की, सनातन मूल्यों, संस्कारों एवं सिद्धांतों के प्रसार की। धर्म की जय और अधर्म के नाश के उद्घोष की। सनातन धर्म की रक्षा हेतु बाबा इज़रायली एक शक्तिशाली विचारधारा है। सनातन सत्य के अस्तित्व को पुनः अन्वेषित करने की यह एक शपथ है।

उठता हुआ यह सहज प्रश्न पूछा जा सकता है कि जब बात सनातन धर्म की हो रही है तो ‘बाबा’ नाम के साथ ‘इज़रायली’ उपनाम क्यों! तो यह स्पष्ट हो कि आधुनिक विश्व में इज़रायल ही एकमात्र वह देश है जो अपने धर्म, अपनी मातृभूमि, अपनी संस्कृति, अपनी मानव-संपदा और सभ्यता को गर्व से न केवल अंगीकार करता है अपितु इसकी रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने का साहस भी रखता है। इसके मूल में है पांच हज़ार वर्ष पूर्व के भारत का रस-रक्त।

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इज़रायल ही वह एकमात्र देश है जो आर्यवर्त की ‘कृष्ण-नीति’ एवं ‘चाणक्य-नीति’ को अक्षरशः अपनाते हुए अपने नागरिकों को उत्तम चरित्र का योद्धा बनाकर यह सुनिश्चित करता है कि कैसे अपने अतीत से सबक सीखकर अपनी महान परंपरा, सभ्यता एवं मातृभूमि को वर्तमान एवं भविष्य के ख़तरों से न केवल बचाना है अपितु उन ख़तरों को समूल नष्ट भी करना है। प्राचीन काल में संपूर्ण विश्व यह ज्ञान भारत से सीखता था परन्तु आज भारत को अपने सनातन-अस्तित्व की रक्षा के लिए इज़रायल से इस नीति को सीखने की आवश्यकता है।

अब आप पूछेंगे कि इस विचारधारा की आवश्यकता क्यों आन पड़ी! उत्तर सरल भी है और जटिल भी। चौथी सदी में गुप्त साम्राज्य के समय भारतवर्ष की भौगोलिक सीमा पूर्व में जावा-सुमात्रा से लेकर पश्चिम में हिंदुकुश पर्वत से होती हुई आज के अफ़ग़ानिस्तान से भी कहीं आगे तक फैली हुई थी। व्यापार, शिक्षा और संस्कृति का केंद्र-बिंदु भारतवर्ष अपनी सम्पूर्ण संपन्नता के लिए विश्वविख्यात था। इसके नायक अपने अवतारों की कलाओं के रहस्य से अवगत थे और उसी अनुसार अपना चरित्र निर्मित और आचरण निर्धारित करते थे।

जब तक भारतवर्ष के शासकों एवं नागरिकों ने मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्यों को भलीभांति निभाया, यह वैभव और संपन्नता सुरक्षित रही किन्तु जैसे-जैसे शासक और नागरिक अपने अपने कर्तव्य को छोड़ प्राचीन महानता का दंभ पालने लगे, वैसे-वैसे विदेशी आक्रांताओं ने इस वैभव और संपन्नता को आराम से लूटना-खसोटना आरम्भ कर दिया। यह क्रम आज भी बिना रुके जारी है। परिणाम हम सभी के सामने है- चाहे खुली आंखों से हम स्वीकार करें या फिर उसे दंभ में नकार दें।

एक बहुत बड़े कालखंड में आर्यावर्ती शासकों और नागरिकों की सतत-अकर्मण्यता आज शेष बचे आर्यखंड को न केवल भौगोलिक रूप से अपितु धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूप से भी खंड-खंड कर रही है। बचा-खुचा आज का आर्यावर्त और अधिक खंडित होने के कगार पर पहुंच गया है। अपने ही देश में सनातन धर्म, संस्कृति एवं इसके अनुयायी निर्वासित होने के कगार पर हैं। देश का राजनीतिक परिदृश्य अंधेरी-कारा होता गया है। एक वर्ग की स्वार्थी एवं कट्टर मज़हबी विचारधारा के चलते उसके हितानुसार संविधान का चयनात्मक आरोपन, भांति-भांति की विघटनकारी शक्तियों का तुष्टिकरण एवं मूल भारतीय समाज के साथ दोहरा आचरण- इस आग में घी डालने जैसा कार्य कर रहे हैं।

‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ नामक सूत्र का मूल-सार है कि अचेत कभी सुरक्षित नहीं होता और सचेत कभी अरक्षित नहीं पड़ता। ध्यान रहे, इसी अचेतावस्था के कारण सनातन जीवन से न केवल भौगोलिक क्षेत्र छीन लिया गया है, अपितु एक वैभवशाली और संपन्न धर्म, संस्कृति, जीवनशैली और इतिहास को काल्पनिक बताकर उसे ग़ुलामों की मानसिकता वाली ज़ंजीरों से जकड़ दिया गया है। अब हालात इतने विकराल हो उठे हैं कि सनातन-समाज को अपना अस्तित्व बचाए रखना तक भारी पड़ रहा है। यदि अब भी न चेते तो समझिए, सुरक्षा हेतु बहुत देर हो जाएगी।

वर्तमान समय मे परिस्थितियां और तज्जनित चुनौतियां इतनी विकट हो चुकी हैं कि यदि भारतवर्ष के सोये हुए सनातनियों को जाग्रत कर इन परिस्थितियों और चुनौतियों को समूल समाप्त न किया गया तो अधिक नहीं, आने वाले मात्र पंद्रह-बीस वर्षों के अंदर ही धरा पर न केवल वह सब कुछ समाप्त हो जायेगा, जिसका संबंध सनातन धर्म, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान और जीवनशैली से है, अपितु एक ऐसे तंत्र की स्थापना भी कर दी जायेगी, जो संपूर्ण रचना और प्राणिजगत के लिए अत्यन्त विध्वंसक है।

ऐसे में आवश्यकता है स्वामी विवेकानन्द के आह्वान को सजीव करने की कि हे आर्य! उठो, जागो और तब तक विश्राम नहीं करना है, जब तक अपने लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाये। अपने इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, सनातन अस्तित्व की रक्षा एवं पुनर्स्थापन के लिए आज के सनातनी राष्ट्रवादी को ‘कृष्ण-नीति’, ‘चाणक्य-नीति’ और ‘इज़रायली-चरित्र’ के मिश्रण से तैयार एक ऐसी विचारधारा को अपनाकर हर चरण बढ़ाना है, हर कर्म करना है और इसी क्रान्ति को तीव्रता से कार्यरूप में परिणत करने वाले वैचारिक व्यक्तित्व का नाम है… ‘बाबा इज़रायली’… और बाबा इज़रायली की विचारधारा से उद्गमित होती नीति का नाम है… ‘इज़रायली 🇮🇱 नीति’…

‘‘उदयाचल पर उतर चला तम का बादल हट जायेगा
पवि की तरह फटो, तामस टुकड़ा-टुकड़ा कट जायेगा
सूर्यसुतो! हर तरह काटनी अन्धकार की कारा है-
चेतो! जागो! उठो! बढ़ो! दौड़ो! यह विश्व तुम्हारा है’’

शलोॐ…!