अपनी अत्यधिक उदारता और सहिष्णुता की क़ीमत चुका रहा है फ्रांस !

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यूरोप के कई महान देशों ने पिछले कई दशकों में तथाकथित उदारता, सहिष्णुता एवं मानवाधिकार के नाम पर अनेक इस्लामी देशों के चरमपंथी शरणार्थियों को अपने देशों में शरण प्रदान की है। प्रथम दृष्टया यूरोपीय देशों के इस कदम के पीछे उनकी सहिष्णुता, उदारता एवं मानवीयता का पक्ष दृष्टिगत होता है, बावजूद इसके यहां पर इस कटु-सत्य से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि उन्होंने भले ही यह क़दम मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए उठाया हो परंतु उनके इस तथाकथित उदार, सहिष्णु एवं मानवतावादी निर्णय ने अनजाने में अपने ही राष्ट्रों की पुरातन सभ्यता, संस्कृति एवं यूरोपीय समाज को नष्ट करने की शुरुआत करने का महापाप किया है।

वर्ष 1990 के दशक में जब रूस ने इस्लामी गणराज्य चेचन्या को उसके द्वारा फैलाए जा रहे इस्लामी आतंकवाद के कारण अत्यंत ही कठोरता के साथ दंडित किया था तो उसके बाद चेचन्या के इस्लामी आतंकवादी रूस की इंटेलिजेंस एजेंसीज़ के द्वारा कुचले जाने के भय से अमेरिकी ध्रुव के हिमायती यूरोपीय देशों में शरणार्थी बनकर पहुंच गए थे। इधर शीत-युद्ध में रूस को अपना प्रतिस्पर्धी देश मानने वाला अमेरिका भी रूस को कूटनीतिक दृष्टि से कमज़ोर करने के लिए हर-संभव प्रयास कर ही रहा था, अतः उसे लगा कि यदि रूस के द्वारा दंडित किए गए इस्लामी आतंकवादियों की दानवीयता को मानवीयता के सांचे में ढालकर रूस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तानाशाह एवं मानवाधिकार विरोधी राष्ट्र के रूप में प्रचारित किया जाए तो उसके विरुद्ध एक वैश्विक माहौल तैयार हो सकता है।

अतः अमेरिका ने अल्पकालिक हितों की पूर्ति के लिए अपने दीर्घकालिक हितों और शांति से समझौता करने का मूर्खतापूर्ण निर्णय लिया और उसने अपने सहयोगी देशों के माध्यम से रूस को लगातार अस्थिर करवाने के लिए षड्यंत्रों को हवा देनी शुरू कर दी। यही वह समय था कि जिसके बाद इस्लामी आतंकवादी इस्लामी मुल्कों को छोड़-छोड़ कर पश्चिमी देशों का रुख़ करने लगे थे। कालांतर में पश्चिमी देशों की आबोहवा इस्लामी आतंकवादियों को इतनी रास आई कि उन्होंने इस्लामी मुल्कों की अपेक्षा यूरोप की सरज़मीं को शांतिप्रिय मज़हब की रोशनाई से आबाद करना अधिक उचित समझा।

ऐसे ही आत्महंता देशों की सूची में एक नाम यूरोप के महान देश फ्रांस का भी आता है जिसे इस्लामी शरणार्थी आतंकवादियों ने अपने ग़ज़वा-ए-यूरोप मिशन में उच्चतम प्राथमिकता पर रखा। चूंकि पिछले तीन दशकों में फ्रांस के अंदर वामपंथी समुदाय की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि हुई है, अतः फ्रांस की पूर्ववर्ती वाममार्गी सरकारों ने अपने देश के दक्षिणपंथी धड़ों के विपरीत नीतिगामी होते हुए इन दुर्दांत इस्लामी शरणार्थी आतंकवादियों को तथाकथित मानवता के नाम पर अपने यहां भारी मात्रा में शरण देना शुरू कर दिया। उस समय शायद फ्रांस को इस बात का स्वप्न में भी अनुमान नहीं रहा होगा कि वह जिस तथाकथित मानवता के नाम पर इन दुर्दांत इस्लामी शरणार्थी आतंकवादियों को अपने यहां शरण देने जा रहा है, आने वाले समय में वही दुर्दांत इस्लामी शरणार्थी उसके लिए बहुत बड़ा सरदर्द बन जाएंगे। फ्रांस की वामपंथी सरकारों की आवश्यकता से अधिक उदारवादी एवं सहिष्णुतावादी नीतियों का फायदा उठाते हुए इन दुर्दांत इस्लामी शरणार्थी आतंकवादियों ने स्वयं को प्रताड़ित और शोषित दिखाकर शुरूआती वर्षों में पहले तो धीरे-धीरे फ्रांस के अंदर अपनी संख्या बढ़ाई परंतु उसके बाद जैसे ही इनकी आबादी 5% से अधिक संख्या को पार कर गई तो ये धीरे-धीरे अपने वास्तविक स्वरूप में दृष्टिगोचर होने लगे।

फ्रांस के आधिकारिक जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार वर्ष 1986 में फ्रांस में ईसाई मत को मानने वाले लोगों की जनसंख्या 82% थी जो कि वर्ष 2012 में घटकर मात्र 51.1% रह गई। वर्ष 1986 में ही फ्रांस में वामपंथी समुदाय की आबादी 15.5% थी जो कि वर्ष 2016 में लगभग 3 गुना बढ़कर 39.6% हो गई। इसका परिणाम यह हुआ कि वर्ष 2001 में फ्रांस में जहां मुस्लिम आबादी 0% थी, वर्ष 2016 में अचानक से बढ़कर 5.6% हो गई (स्त्रोत के लिए कृपया यहां क्लिक करें)। अनुमानों के अनुसार वर्तमान समय में फ्रांस में मुस्लिम आबादी लगभग 10% की संख्या को छू चुकी है जिसके परिणाम आए दिन फ्रांस में दैनिक अखबारों में दृष्टिगोचर होते रहते हैं।

अभी कुछ दिन पहले ही फ्रांस से एक ताज़ा मामला संज्ञान में आया है जिसमें वर्षों पहले चेचन्या से आए हुए एक परिवार के बाल इस्लामी शरणार्थी आतंकवादी मोहम्मद अब्दुल्ला ने अपने एक अध्यापक सैमुअल पेटी का गला काटकर केवल इसलिए उनकी हत्या कर दी क्योंकि उन्होंने अपनी कक्षा के अंदर ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ नामक विषय को पढ़ाते हुए पैग़म्बर मोहम्मद के कुछ कार्टून दिखाए थे। अपने अध्यापक का सर क़लम करने वाले चेचेन्याई मूल के बाल इस्लामी शरणार्थी आतंकवादी मोहम्मद अब्दुल्ला की उम्र लगभग 18 वर्ष है और उसके माता-पिता कट्टर जिहादी मतावलंबी हैं। अध्यापक सैमुअल पेटी के विरुद्ध बाल इस्लामी शरणार्थी आतंकवादी मोहम्मद अब्दुल्लाह के पिता एवं विश्व के कई मुजाहिदीन मुल्ला-मौलवियों ने इंटरनेट पर निरंकुश अभियान छेड़ रखा था।

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फ्रांस में हुई सैमुअल पेटी की हत्या से केवल फ्रांस ही नहीं बल्कि पूरे यूरोप में इस्लामी आतंकवाद के विरुद्ध जनव्यापी रोष की लहर फैल गई है। फ्रांसीसी सरकार ने अब्दुल्ला के साथ-साथ दर्जनों ऐसे इस्लामी मुजाहिदीन को गिरफ्तार कर लिया है, जिनके वक्तव्यों, संकेतों और षड्यंत्रों के कारण यह दुर्दांत हत्याकांड हुआ है। साथ ही फ्रांसीसी सरकार ने तबलीगी जमात के द्वारा देश के अंदर वैचारिक आतंकवाद फैलाने वाली ‘पेरिस मस्जिद’ पर भी अगले 6 महीनों के लिए ताले ठोंक दिए हैं। फ्रांस के गृहमंत्री ने कहा है कि हम अपने देश के दुश्मनों को एक मिनट भी चैन से नहीं बैठने देंगे। इस्लामी आतंकवाद की वेदी पर बलिदान हुए अध्यापक सैमुअल पेटी के लिए फ्रांसीसी सरकार ने अपने सर्वोच्च सम्मान की घोषणा भी की है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि अब वे ‘इस्लामी अलगाववाद (आतंकवाद)’ के विरुद्ध ज़ोरदार अभियान चलाएंगे।

विदित हो कि फ्रांस में गैर-फ्रांसीसी मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग 60 से 70 लाख के बीच है। यह जनसंख्या फ्रांस की कुल जनसंख्या का लगभग 10% है। पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस में हुए आतंकवादी हमलों के बाद फ्रांसीसी सरकार ने इन पर निगरानी रखनी शुरू कर दी है। आंकड़ों के अनुसार फ्रांस में उपस्थित अफ्रीकी, तुर्की और मध्य एशियाई मूल के इस्लामी शरणार्थी आतंकवादियों में लगभग सभी शरणार्थी पूर्णतः मुजाहिदीन हैं। ये लोग इतने लंबे समय तक फ्रांस की उदारवादी और बहुलतावादी संस्कृति में रहने के उपरांत भी अपनी मज़हबी कट्टरता और आतंकवादी मानसिकता का परित्याग नहीं कर पाए हैं। ये इस्लामी शरणार्थी आतंकवादी पांचों वक़्त के नमाज़ी हैं, लंबी दाढ़ी रखते हैं, टोपी पहनते हैं, अपनी महिलाओं को बुर्क़े में क़ैद रखते हैं और फ्रांस की आधुनिक शिक्षा को छोड़कर मदरसा-शिक्षा की इस्लामी जिहादी तालीम को ही आत्मसात करना पसंद करते हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस समय फ्रांस में 2,300 से अधिक मस्जिदें सक्रिय हैं जिनके माध्यम से पिछले दो दशकों में एक लाख से अधिक फ्रांसीसियों को ईसाई से मुस्लिम बनाया गया है। तुर्की सहित कई अरब देशों की मदद से ये फ़्रांसीसी इस्लामी शरणार्थी फ्रांस सहित पूरे यूरोप में आतंक का बड़ा जाल बिछा रहे हैं।

वर्ष 2005-06 में इस्लामी चरमपंथी धड़ों के द्वारा पैग़म्बर के कार्टूनों को लेकर डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अखबार के विरुद्ध इतना भयंकर अभियान चलाया गया जिसके परिणामस्वरूप इस्लामी देशों और यूरोप में लगभग ढाई सौ से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। वर्ष 2015 में इन्हीं कार्टूनों को लेकर फ्रांस की प्रसिद्ध व्यंग्य-पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के 12 पत्रकारों की निर्मम-हत्या कर दी गई। इस पत्रिका में इस्लाम ही नहीं बल्कि ईसाई और यहूदी मज़हबों के विरुद्ध भी कार्टून और लेख छपा करते थे।

फ़िलहाल, भविष्य की कालिमा को भांपकर अब यूरोप के लोगों के अंदर से पूर्ववर्ती तथाकथित उदारवादिता और सहिष्णुता का वह भाव धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है जो भारत-जैसे अति-सेकुलर एवं भाईचारे वाली तथाकथित गंगा-जमुनी तहज़ीब का झंडा बुलंद करने वाले मासूम देशों में अभी भी हिलोरें मार रहा है। गत महीनों में वहां के दक्षिणपंथी ईसाई संगठनों ने कई मस्जिदें गिरा दी हैं और वे यूरोप में भारी मात्रा में हो रहे धर्म-परिवर्तनों का कट्टर विरोध कर रहे हैं। वे मुस्लिमों को रोज़गार देने का भी विरोध कर रहे हैं। वे समस्त मदरसों को बंद करने की मांग भी कर रहे हैं। यूरोप में अब धीरे-धीरे ही सही परंतु ईसाई-दक्षिणपंथी धड़ों और इस्लामी मज़हबी चरमपंथियों के मध्य सीधी टक्कर शुरू हो गई है। उम्मीद है कि यूरोप के अलावा विश्व के बाक़ी देश भी अपने पूर्वकालिक मूर्खतापूर्ण निर्णयों से जुड़े इतिहास से सबक़ लेते हुए अपने पुराने ढर्रों को छोड़कर आने वाले समय में आतंकवाद के विरुद्ध तीक्ष्णतम नीतियों को अपनाएंगे अन्यथा आने वाले समय में पूरे विश्व में ऐसा इस्लामी तांडव होगा जिसकी किसी ने स्वप्न में भी परिकल्पना नहीं की होगी।

शलोॐ…!